वीर छत्रसाल बुंदेला

भारत के इतिहास में अपना नाम लिखवाने की होड़ में प्रत्येक क्षत्रिय शामिल हुआ है । प्रत्येक क्षत्रिय अपने कुल का , ओर अपना इतिहास गौरवशाली बनाने के लिए अथक प्रयास करता रहा है । इस महान संघर्ष के लिए, बहुत लोगो को उपयोगी संसाधन भी मिल गए, जबकि कुछ लोगो के हिस्से में केवल ” शत्रु ओर संघर्ष ” ही आये । ऐसे ही कुछ चुनिंदा लोगो मे नाम आता है, वीर क्षत्रसाल बुंदेला का । जिन्होंने अपनी शुरुवात शून्य से की, ओर उन वीर पुरुष का इतिहास कुछ ऐसे लिखा गया ।

” छत्ता तेरे राज में धरती धक धक होए
जित जित घोड़ा मुख करें, उत उत फत्ते होए “

वीर छत्रसाल ने शून्य से अपनी यात्रा प्रारंभ कर आकाश-सी ऊंचाई का स्पर्श किया। उन्होंने विस्तृत बुंदेलखंड राज्य की गरिमामय स्थापना ही नहीं की थी, वरन साहित्य सृजन कर जीवंत काव्य भी रचे। छत्रसाल ने अपने 82 वर्ष के जीवन और 44 वर्षीय राज्यकाल में 52 युद्ध किये थे। शौर्य और सृजन की ऐसी उपलब्धि बेमिसाल है-

‘‘इत जमना उत नर्मदा इत चंबल उत टोंस।
छत्रसाल से लरन की रही न काह होंस।’’

छत्रसाल के पिता चम्पकराय भी मुगलो के संघर्ष करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे , ओर उनकी माता ने जौहर किया था , उस समय छत्रसाल की उम्र मात्र बारह वर्ष थी । छत्रसाल के लिए पिता और माता का यह दुःख और भी ज़्यादा गहरा था, क्यो की उनकी मृत्यु के जिम्मेदार उनकी सेना के कुछ घूसखोर लोग ही जिम्मेदार थे । विंध्य पर्वतों पर ही छत्रसाल का जन्म हुआ था, उस समय भी उनके पिता मुगलो से संघर्ष ही कर रहे थे । वनों में जन्मे वनराज छत्रसाल ने जन्म लेने के साथ ही केवल संघर्ष, सिंहो , तोपों ओर तलवारों की आवाजें ही सुनी । हथियार ही खिलौने बने, ओर युद्ध खेल ।

अपने पिता की मृत्यु के बाद छत्रसाल जिसके बहादुर मां-बाप ने आत्महत्या की हो, जिसके पास कोई सैन्य बल अथवा धनबल भी न हो, ऐसे 12-13 वर्षीय बालक की मनोदशा की क्या आप कल्पना कर सकते हैं? परंतु उसके पास था बुंदेली शौर्य का संस्कार, बहादुर मां-माप का अदम्य साहस और ‘वीर भोग्य वसुंधरा’ का गहरा आत्मविश्वास। इसलिए वह टूटा नहीं, डूबा नहीं, आत्मघात नहीं किया वरन् एक रास्ता निकाला। उसने अपने भाई के साथ पिता के दोस्त राजा जयसिंह के पास पहुंचकर सेना में भरती होकर आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण लेना प्रारंभ कर दिया।

महाराजा जयसिंह उस समय ओरंगजेब के लिए कार्य करते थे । उन्होंने 1665 में बीजापुर युद्ध मे बड़े पराक्रम का परिचय दिया, उस युद्ध मे छत्रसाल की प्रतिभा का डंका चारो ओर बज गया , लेकिन मुगल दरबार मे चाटुकार बनकर रहना छत्रसाल को कतई मंजूर नही था । अतः मुगलो के चंगुल से निकलकर वे छत्रपति शिवाजी महाराज के पास पहुंचे ।

उनसे मिलकर शिवाजी बहुत प्रभावित हुए । शिवाजी ने उनकी आंखों पर वही लौ देखी, जो स्वम् शिवाजी के खुदके ह्रदय में धधक रही थी । उन्होंने छत्रसाल से कहा –

करो देस के राज छतारे
हम तुम तें कबहूं नहीं न्यारे।
दौर देस मुगलन को मारो
दपटि दिली के दल संहारो।
तुम हो महावीर मरदाने ।।

इस तरह के वचन बोलकर शिवाजी महाराज ने छत्रसाल का खूब उत्साहवर्धन किया ।

शिवाजी से स्वराज का मंत्र लेकर सन 1670 में छत्रसाल वापस अपनी मातृभूमि लौट आये परंतु तत्कालीन बुंदेल भूमि की स्थितियां बिलकुल भिन्न थीं। ज़्यादातर रियासतदार मुगलों के मनसबदार थे, छत्रसाल के भाई-बंधु भी दिल्ली से भिड़ने को तैयार नहीं थे। स्वयं उनके हाथ में धन-संपत्ति कुछ था नहीं। दतिया नरेश शुभकरण ने छत्रसाल का सम्मान तो किया पर बादशाह से बैर न करने की ही सलाह दी। ओरछा नरेश सुजान सिंह ने अभिषेक तो किया पर संघर्ष से अलग रहे। छत्रसाल के बड़े भाई रतनशाह ने साथ देना स्वीकार नहीं किया तब छत्रसाल ने राजाओं के बजाय जनोन्मुखी होकर अपना कार्य प्रारंभ किया। कहते हैं उनके बचपन के साथी महाबली तेली ने उनकी धरोहर, थोड़ी-सी पैत्रिक संपत्ति के रूप में वापस की जिससे छत्रसाल ने 5 घुड़सवार और 25 पैदलों की छोटी-सी सेना तैयार कर ज्येष्ठ सुदी पंचमी रविवार वि.सं. 1728 (सन 1671) के शुभ मुहूर्त में शहंशाह आलम औरंगजेब के विरूद्ध विद्रोह का बिगुल बजाते हुए स्वराज्य स्थापना का बीड़ा उठाया।

छत्रसाल की प्रारंभिक सेना में राजे-रजवाड़े नहीं थे अपितु तेली बारी, मुसलमान, मनिहार आदि जातियों से आनेवाले सेनानी ही शामिल हुए थे। चचेरे भाई बलदीवान अवश्य उनके साथ थे। छत्रसाल का पहला आक्रमण हुआ अपने माता-पिता के साथ विश्वासघात करने वाले सेहरा के धंधेरों पर। मुगल मातहत कुंअरसिंह को ही कैद नहीं किया गया बल्कि उसकी मदद को आये हाशिम खां की धुनाई की गयी और सिरोंज एवं तिबरा लूट डाले गये। लूट की सारी संपत्ति छत्रसाल ने अपने सैनिकों में बांटकर पूरे क्षेत्र के लोगों को उनकी सेना में सम्मिलित होने के लिए आकर्षित किया। कुछ ही समय में छत्रसाल की सेना में भारी वृद्धि होने लगी और उन्हेांने धमोनी, मेहर, बांसा और पवाया आदि जीतकर कब्जे में कर लिए।
ग्वालियर-खजाना लूटकर सूबेदार मुनव्वर खां की सेना को पराजित किया, बाद में नरवर भी जीता। सन 1671 में ही कुलगुरु नरहरि दास ने भी विजय का आशीष छत्रसाल को दिया।
ग्वालियर की लूट से छत्रसाल को सवा करोड़ रुपये प्राप्त हुए पर औरंगजेब इससे छत्रसाल पर टूट-सा पड़ा। उसने सेनपति रणदूल्हा के नेतृत्व में आठ सवारों सहित तीस हजारी सेना भेजकर गढ़ाकोटा के पास छत्रसाल पर धावा बोल दिया। घमासान युद्ध हुआ पर दणदूल्हा (रुहल्ला खां) न केवल पराजित हुआ वरन भरपूर युद्ध सामग्री छोड़कर जन बचाकर उसे भागना पड़ा। इस विजय से छत्रसाल के हौसले काफी बुलंद हो गये।
सन 1671-80 की अवधि में छत्रसाल ने चित्रकूट से लेकर ग्वालियर तक और कालपी से गढ़ाकोटा तक प्रभुत्व स्थापित कर लिया।
सन 1675 में छत्रसाल की भेंट प्रणामी पंथ के प्रणेता संत प्राणनाथ से हुई जिन्होंने छत्रसाल को आशीर्वाद दिया-

छत्ता तोरे राज में धक धक धरती होय
जित जित घोड़ा मुख करे तित तित फत्ते होय।

बुंदेले राज्य की स्थापना

इसी अवधि में छत्रसाल ने पन्ना के गौड़ राजा को हराकर, उसे अपनी राजधानी बनाया। ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया संवत 1744 की गोधूलि बेला में स्वामी प्राणनाथ ने विधिवत छत्रसाल का पन्ना में राज्यभिषेक किया। विजय यात्रा के दूसरे सोपान में छत्रसाल ने अपनी रणपताका लहराते हुए सागर, दमोह, एरछ, जलापुर, मोदेहा, भुस्करा, महोबा, राठ, पनवाड़ी, अजनेर, कालपी और विदिशा का किला जीत डाला। आतंक के मारे अनेक मुगल फौजदार स्वयं ही छत्रसाल को चैथ देने लगे।
बघेलखंड, मालवा, राजस्थान और पंजाब तक छत्रसाल ने युद्ध जीते। परिणामतः यमुना, चंबल, नर्मदा और टोंस मे क्षेत्र में बुंदेला राज्य स्थापित हो गया।
सन 1707 में औरंगजेब का निध्न हो गया। उसके पुत्र आजम ने बराबरी से व्यवहार कर सूबेदारी देनी चाही पर छत्रसाल ने संप्रभु राज्य के आगे यह अस्वीकार कर दी।
महाराज छत्रसाल पर इलाहाबाद के नवाब मुहम्मद बंगस का ऐतिहासिक आक्रमण हुआ। इस समय छत्रसाल लगभग 80 वर्ष के वृद्ध हो चले थे और उनके दोनों पुत्रों में अनबन थी। जैतपुर में छत्रसाल पराजित हो रहे थे। ऐसी परिस्थितियों में उन्हेांने बाजीराव पेशवा को पुराना संदर्भ देते हुए सौ छंदों का एक काव्यात्मक पत्र भेजा जिसकी दो पंक्तियां थीं

“जो गति गज और ग्राह की सो गति भई है आज बाजी जात बुन्देल की राखौ बाजी लाज”

फलतः बाजीराव की सेना आने पर बंगश की पराजय ही नहीं हुई वरन उसे प्राण बचाकर अपमानित हो, भागना पड़ा। छत्रसाल युद्ध में टूट चले थे, लेकिन मराठों के सहयोग से उन्हेांने कलंक का टीका सम्मान से पोंछ डाला।

इसी कारण छत्रसाल ने अपनी सम्पति का बंटवारा तीन हिस्सों में किया । उन्होंने एक पुत्र बाजीराव पेशवा को भी माना, ओर अपनी सम्पति का एक हिस्सा बाजीराव पेशवा को भी बंटवारे में दिया ।

वीर छत्रसाल जीवन भर अजेय रहे । वह वीर होने के साथ साथ महान विद्धवान ओर विद्धानों की कद्र करने वाले पुरुष भी थे । इतिहास का अद्वितीय उदाहरण है, की कवि भूषण के उनके राज्य आगमन पर छत्रसाल ने उनकी पालकी को अपना भी एक कंधा दे दिया । इस पर कवि भूषण भी बोल उठे —

” और राव राजा एक चित्र में न ल्याऊं-
अब, साटू कौं सराहौं, के सराहौं छत्रसाल को “

साभार- रामकृष्ण पुरोहित

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