हर्षवर्धन बैंस और कश्मीर के हुण

गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारत में चारो और अराजकता फ़ैल गयी थी। भारतीय सीमाएं असुरक्षित हो गयी थी , शत्रु भारत को आँखे दिखा रहे थे। किन्तु यह इस धरती का सोभाग्य रहा है , जब जब इस देश पर कोई बड़ा संकट आया , वीर राजपूत उस संकट के समय में पहले से ज़्यादा निखर के समाज के सामने आये , तथा देश व् धर्म की रक्षा की। गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद मौखरि और पुष्यभूति वंश के राजा अस्तित्व में आये। महाराज पुष्यभूति ने ही इस वंश की स्थापना की थी , आज यह पुष्यभूति वंश के लोग बैंस राजपूत नाम से जाने जाते है। महाराज पुष्यभूति एक महान शिवभक्त थे। पूरा संसार ही पुष्यभूति महाराज के लिए शिवमय था , बैंस राजपूत शैव पंथ के अनुयायी ही थे , इसीकारण भगवान् शिव से आस्था होने के कारण अपने प्रतीकों में नाग भी रखते थे , हर्षचरित्र में कहा गया है , की पुष्यभूति वंश ने यहाँ थानेश्वर में नागो को हटाकर ही सत्ता पर कब्जा किया था , इस नाग युद्ध के के बाद ही इस वंश की नीव पड़ी।

हर्षवर्धन ने भी सारी मुश्किल स्थितियों को परास्त किया , और उन्होंने अपना नाम भारत के उन राजाओ के साथ अमर कर दिया जो कलयुग में सतयुग सा शाशन जनता के समक्ष करके गए थे। महाराज हर्षवर्धन बैंस को ” हूण – हिंरण -केसरी ” भी कहा जाता है , जिसका अर्थ है , हिरण रूपी हूणों के लिए घातक सिंह के समान। बांसखेड़ा तामपत्रों से हमे यह भी ज्ञात होता है , हर्षवर्धन ने गुर्जर राजाओ की भी नींद उड़ाकर रख दी। इतना तय है की इस वंश ने भारत के एक बहुत बड़े भाग पर विजय प्राप्त की थी। सिंध तथा मालवा से इन्होंने हूणों को परास्त कर उन्हें खत्म ही कर दिया था , या उन्हें हिन्दू बना लिया था। कश्मीर में हूणों का शाशन ही हो गया था , यहाँ सम्राट हर्षवर्धन ने ४ बार आक्रमण करके , कश्मीर से हूणों को खदेड़कर रख दिया था।

गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारत कई टुकड़ो में विभाजित हो गया था। महाराज प्रभाकरण ने बहुत हद तक भारत को एक कर भी दिया था। उस समय भारत की स्तिथि यह थी , की टुकड़ो में बंटा भारत का प्रत्येक राज्य वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहा था। बंगाल तथा बिहार के गौड़ राज्य स्वतंत्र हो गए थे। मध्यदेश में मौखरि वंश अपनी शक्ति बढ़ा रहा था , चालुक्य भी अपनी शक्ति का डंका बजाने के लिए आतुर थे, तो प्रतिहार भी शक्ति प्रदर्शन में पीछे नहीं थे। और इन सब के बीच हुणो का खतरा बना ही हुआ था।

प्रभाकरन ने धीरे धीरे कई राज्यों को मिलकर भारत के बहुत बड़े हिस्से को लगभग एक क्र दिया था। प्रभाकरन एक बहुत ही सरल स्वभाव के शक्तिशाली राजा थे , उन्होंने भगवान् सूर्य की खूब पूजा की थी , सूर्य के आशीर्वाद स्वरूप ही उन्हें ३ संताने प्राप्त हुई , जिनमे से एक संतान कन्या थी , उसका विवाह मौखरि वंश के हुआ , मौखरि वंश पहले पुष्यभूति वंश का शत्रु हुआ करता था , लेकिन कौटिल्य ने भारतीयों को नया ज्ञान दिया था , राजनीती में ना तो कोई किसी का मित्र होता है , और ना शत्रु। मौखरि और बैंस राजवंश वैवाहिक सम्बन्ध से बैंस राजपूतो की शक्ति में और इजाफा हुआ , और मौखरि वंश की भी शक्ति दुगनी हो गयी।
बड़ी ही बड़ी संतान राजयवर्धन बहुत पराक्रमी योद्धा था , और हर्ष के तो जन्म होते ही सभी ज्योतिषो ने उसके चक्रवर्ती सम्राट बनने के लक्षण बताये थे।

इस समय महाराज प्रभाकरन का स्वास्थ ठीक नहीं था , और हूणों का आक्रमण भारत पर हो गया , राजवर्धन हूणों से युद्ध करने निकल पड़े , यहाँ महाराज प्रभाकरण ने अपने पुत्र हर्ष को अपने पास बुलाया और कहने लगे ” सदैव अपनी मात्रृभूमि की रक्षा करना हर्ष , अपनी चंचलता तथा अपने बालपन का त्यागकर। , वंश समेत अपने शत्रु का विनाश करना। यह कहकर प्रभाकरण ने अपनी आँखे बंद कर ली।

पिता की जिस समय मृत्यु हई , बड़े भाई राजयवर्धन हूणों से युद्ध करने में व्यस्त था , राजवर्धन हूणों को परास्त कर अपनी सीमा में वापस लौट रहे थे तभी उन्हें अंदेशा हो गया था की उनके राज्य में कुछ अशुभ हुआ है।

इस समय बड़े भ्राता राजयवर्धन राज्य में नहीं थे , पिता का स्वर्गवास हो गया था , हर्ष के लिए राज्य अब एक रोग बनकर रह गया , उंन्हे यह डर सताने लगा की कहीं पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर बड़े भाई सन्यास धारण कर वनो में तपश्या के लिए ना निकल जावें। हे ईश्वर। . यह धरती अनाथ हो गयी।

हूणों को परास्त कर जब राजयवर्धन अपने प्रदेश लौटे , तो राज्य की सीमा से ही उन्हें कुछ अशुभ होने का अंदेशा हो गया था , लेकिन जब दरबार पहुंचे , और यहाँ अपने पिता का सिंहासन रिक्त देखा तो वहीँ हुआ , जिसका डर हर्ष समेत सभी को था। राजयवर्धन के हाथ से तलवार छूट गयी , वाई वैरागी हो गए। भाई के हाथों तलवार छूटते देख हर्ष को गहरा सदमा लगा। भाई और पिता के बिना उन्हें इस राज्य का करना ही क्या है ?

हर्ष के अंतर्मन ने उन्हें तत्काल आवाज दी , इतना सोचते क्या हो हर्ष ? लक्ष्मण की तरह तुम भी अपने भाई के साथ चल देना।

दोनों भाई जब एक दूसरे के आंसू पोंछ पिता के निधन का दुःख बना रहे थे , उसी समय दरबार में एक और दुखद सुचना मिली , जिस दिन प्रभाकरण की मृत्यु हुई थी , मालवा के राजा ने मौखरि राज्य पर हमला कर उनके बहन के पति देवगृहवर्मन की हत्या कर दी , तथा उनकी बहन को कैद करके कारावास में डाल दिया। यह समाचार मिलते ही राजयवर्धन का खून खोल उठा। राजयवर्धन ने मालवा पहुंचकर मालवराज की बड़ी बुरी गति कर दी , घोड़े को पीटने वाले चाबुक से मालवराज और उसके सेनिको को धुलाई की गयी। अंत में मालवराज ने अपने हथियार राजयवर्धन के सामने डाल दिए , और अपने अपराध के लिए पश्चयताप किया। लेकिन यह भी मालवराज का ेल छल ही था , राजवर्धन की धोखे से हत्या कर दी गयी।

लेकिन इस विषम परिस्थिति में भी हर्ष ने अपना संयम नहीं खोया। पहले माता , उसके बाद पिता , और अब भाई , अपना सारा परिवार खोकर हर्ष केवल पत्थर की मूर्ति बनकर रह गए , एक के बाद एक दारुन दुःखो की बाढ़ उनपर पड़ रही थी। इस विकट परिस्थिति में भी हर्ष सिंह की तरह दहाड़ पड़े

” अधर्मी गोड़ ने सिर्फ अपयश की कमाया है , देखता हूँ अब में , की वह दुर्बुद्धि अब कहाँ तक भागता है।

तभी उनके मंत्री सिंघनाद ने उन्हें शिक्षा दी >> मात्र एक अधर्मी गोड़ राजा का वध करने से क्या होगा हर्ष ? करना है तो कुछ ऐसा करो , की फिर ऐसा दुःसाहस कोई कर ना सके। सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त करो , राजलक्ष्मी को स्थिर कर सम्पूर्ण विश्व पर अपनी विजय पताका फहराओ। शत्रुओ का वध करो , राष्ट्र के सारे कटंको को उखाड़ फेंको। अपने पिता भाई तथा सभी पूर्वजो को अपना आदर्श मान उनका अनुसरण करो। अब इस पृथ्वी की रक्षा के लिए केवल तुम्ही शेष बचे हो हर्ष। अपनी इस अनाथ प्रजा के नाथ बनो , उन्हें सारे सुख दो , और सभी राजाओ के माथे पर अपना हाथ रखो।

इस तरह एक बुजुर्ग मंत्री ने हर्षवर्धन को दिग्विजय की प्रेरणा दी। हर्ष ने अपने समय के सभी राजाओ के बीच यह सन्देश पहुंचा दिया , की या तो वे हर्ष से युद्ध करें , या अपना धनुष या शीश हर्ष के आगे झुका ले। किसी राजा की हिम्मत नहीं हुई की हर्ष का वह सामना कर पाते। हर्ष ने अपनी शाशन व्यवस्था को इतना उत्तम बना दिया की , उनके काल में घरो में ताले लगने बंद हो गए थे। ऐसा नहीं गुप्त काल के बाद सबसे ज़्यादा शक्तिशाली बैंस राजपूत यानि पुष्यभूति कुल ही हुआ था , गुप्त वंश के सामंत पल्ल्व , मौखरि , तथा चालुक्य भी एक बड़ी शक्ति बनकर उभरे। लेकिन भारत को एक करने का सबसे बड़ा दाइत्व हर्षवर्धन ने उठाया था। पुलकेशिन द्वितीय के साथ हुए युद्ध के बाद भारत दो हिस्सों में बंट गया , आधे भारत पर चालुक्यों का सिक्का चल रहा था , यो आधे भारत पर हर्षवर्धन का।
लेकिन वास्तविकता यही है , हर्षवर्धन के बाद भारत लगभग पूरी तरह टूट करे बिखर गया था। हर्ष के शाशन के अंत होने के १०० वर्ष बाद ही भारत गुलाम बन गया था। हर्ष तक चाहे जो भी हो , विदेशी आक्रमणों पर तो राजपूत एक हो जाते थे , उस समय सभी का एक लक्ष्य था , हूणों या यवनो को भगाना है , इसके अलावा आपसी कोई संघर्ष नहीं था। लेकिन समय की ऐसी मार पड़ी राजपूत अपनेर ही देश में अलग हुए , की इसके परिणामस्वरूप ही अफगानिस्तान से लेकर समरकंद , ईरान , बलूचिस्तान , और यहाँ तक की आधा पंजाब हमारे हाथ से चला गया।

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