संस्कृत और तमिल की प्राचीनता

तमिल भाषा में लिखा, संस्कृत का प्रणवाक्षर “ॐ” और मंदिर का दीप

तमिल भाषा में लिखा, संस्कृत का प्रणवाक्षर “ॐ” और मंदिर का दीप

बीते रविवार मन की बात से मन खिन्न हो गया, वही मन की बात, मोदी जी वाली। साहेब कहते हैं, तमिल संस्कृत से अधिक प्राचीन है। बीते मार्च, अपनी पुस्तक “एग्जाम वॉरियर्स” के प्रमोशन में साहेब ऐसी टिप्पणी कर चुके हैं, अब पुन:, वही भी विश्व संस्कृत दिवस के रोज़!

विश्व संस्कृत दिवस के लेख पर दो मित्रों की टिप्पणी मिली : “अनुराग जी, ऐसा सुना है कि तमिल भाषा संस्कृत भाषा से अधिक प्राचीन है, आपका क्या मत है इसमें?” – इस पर मैं कहना चाहूँगा कि भाषाओं का ये मतभेद कभी भी वास्तविक भाषाप्रेमी को रुचिकर नहीं लगता, राजनेता को अवश्य प्रिय लगता होगा।

चूँकि द्रविड़ संस्कृति हमारी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। आज भी द्रविड़ मंदिरों के वैदिक संस्कृत उच्चारण की शुद्धता की कोई उपमा नहीं।

बहरहाल, ये सत्य किसी तर्क का मोहताज नहीं कि संस्कृत ही प्राचीन है। फिर भी, संक्षेप में, मैं अपना मत, जोकि संस्कृत भाषा की प्राचीनता की ओर है, बिंदुवार प्रकट करने हेतु उद्यत हुआ हूँ।

महर्षि वाल्मीकि ने तमिल भाषा को संस्कृत की ही एक बोली माना है। कैसे?

प्रसंग देखिए, हनुमान जी लंका जा पहुँचे हैं। सीता के ठीक ऊपर अशोक की डाल पर बैठे हैं, और नीचे हो रहे घटनाक्रम को देख रहे हैं, सुन रहे हैं।

सर्वप्रथम वे देखते हैं कि सीता जी की सुरक्षा में लगीं राक्षसियाँ संस्कृत में वार्तालाप कर रही हैं। फिर रावण आते है और रावण व सीता का वार्तालाप भी संस्कृत में होता है। फिर मंदोदरी व रावण भी संस्कृत में बतियाते हैं।

कुलमिला कर, हनुमान जी इस नतीजे ओर पहुँचे कि यहाँ सभी लोग संस्कृत में वार्ता करते हैं। और जब वे माता सीता से वार्ता करने पहुँचे, तो उन्होंने “तमिल” भाषा का प्रयोग किया।

महाकवि ने इस भाषा को “मधुरम्” कहा है, अर्थात् कोमल व सरल उच्चारण युक्त, ताकि सीता जी को ये संदेह न हो कि वानर कहीं लंका का ही तो नहीं!

संस्कृत की अपेक्षा तमिल अधिक कोमल है, मधुरम् है, सौच्चारण्य है। उदाहरण के लिए देखें :–

संस्कृत में एक शब्द है, “कृष्ण”। इसका तमिल वर्शन है, “किरूत्तिनन”, यहीं से तमिल के “कृष्णन” शब्द की उत्पत्ति है। संस्कृत का “सहस्त्रम्”, तमिल में “आयरम” हो जाता है। संस्कृत का “स्नेह”, तमिल में केवल “ने” में सिमट गया है।

ये पद्धति तत्सम शब्दों से तद्भव निर्माण की गति को निदर्शित करती है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह “दिनकर” ने अपनी प्रसिद्ध गद्यरचना “संस्कृति के चार अध्याय” में लिखा है : “तमिल भाषा हर शब्द को अपनी प्रकृति में ढाल लेती है।”

भाषा की ये प्रकृति, बोलियों में ही देखी जाती है। जैसे कि उर्दू का “शऊर”, भोजपुरी में “शहूर” हो जाता है। हिंदी का “अंधा”, भोजपुरी में “आन्हर” हो जाता है।

जितना अंतर खड़ी बोली और आँचलिक में होता है, क़रीब क़रीब उतना ही अंतर संस्कृत और तमिल में है। तमिल को संस्कृत की बोली सिद्ध करने में अन्य द्रविडियन भाषाओं के साक्ष्य भी आवश्यक हैं।

यथा, मलयालम-कन्नड़-तेलगू की त्रयी का पर्याप्त संबंध संस्कृत से है, किंतु तमिल इनसे इतना संबंध स्थापित नहीं कर पाती है। जबकि संस्कृत की सर्वस्वीकार्यता का स्तर ये है कि संस्कृत न केवल तमिल से बल्कि प्रत्येक भाषा से निकटता दर्शाती है।

ये ठीक वैसे ही है, कि भोजपुरी-अवधी-बुंदेलखंडी की त्रयी आपस में दूरस्था लिए हैं। किंतु खड़ी हिंदी के निकट पाती हैं स्वयं को। जिस प्रकार आज उत्तर भारत की लगभग सभी भाषाएँ हिंदी की निकटता लिए हैं, उसी प्रकार प्राचीन काल से ही दक्षिण की चारों भाषाएँ संस्कृत से निकटता लिए हैं।

बोलियों को जब समृद्ध होने की आवश्यकता होती है, तब वे भाषाओं की ओर आती हैं। आदि शंकराचार्य के संस्कृत पौरुष से लेकर भक्ति आंदोलन तक, केवल और केवल दक्षिण के धर्मगुरुओं ने उत्तर और संस्कृत का रूख किया है, उत्तर सिर्फ़ एक बार ऋषि अगस्त्य के रूप में दक्षिण गया है।

और दक्षिण इस योग्य निर्मित कर दिया कि वे अब उत्तर अधिक प्राचीन होने के खोखले दावे करें!

तमिल की प्राचीनता:-

प्राचीन काल से ही परंपरा है कि बोलियों का मुद्रित साहित्य कम ही होता है। दक्षिण की कुछ गुफ़ाओं से प्राप्त तमिल अभिलेखों की कार्बन डेटिंग पहली या दूसरी शताब्दी की ओर इंगित करती है।

सातवीं शताब्दी में प्रथम बार कुछ ऐसे दानपत्र मिलते हैं, जिनपर संस्कृत के साथ साथ तमिल में भी लिखा गया है। चूँकि बीती छः शताब्दियों में तमिल बोली अपने भाषा रूप को प्राप्त करने हेतु कुछ पग बढ़ा चुकी थी।

दक्षिण के पल्लव-चोल-पांड्य राजवंश त्रयी ने अपने अभिलेख संस्कृत और तमिल दोनों में सामूहिक रूप से मुद्रित किए। यथा – राजेंद्र चोल का सुप्रसिद्ध “तिरुवलंगाडु” दानपत्र, जिसमें कुल इकतीस विशाल पत्र है, जो ताँबे से निर्मित हैं।

किंतु तमिल के मुद्रण की विधि में सतत बदलाव स्पष्ट दिखाई देता है। चूँकि एक बोली, भाषा बनने के मार्ग पर थी।

इस सब के बाद नौंवी-दसवीं शताब्दी में, तमिल के स्वतंत्र अभिलेख मिलते हैं। चूँकि तमिल बोलने वालों की संख्या उन्हें पृथक् रूप से अभिहित किए जाने योग्य हो चुकी थी। तमिल भाषा को अपनी पृथक् लिपि प्राप्त करने तक पंद्रहवीं शताब्दी आ चुकी थी। किंतु बदलाव सतत जारी थी।

महामंडलेश्वर स्वामी वालक्कायम द्वारा चौदह सौ पचास के आसपास लिखी गयी तमिल लिपि को सर्वाधिक प्रयोजनमूलक मानकर, आज भी उसी पद्धति से तमिल का मुद्रण होता है।

बस इतना ही पुराना है तमिल का इतिहास!

संस्कृत और तमिल के कुछ तथ्यात्मक उदाहरण:–

पाणिनि की अष्टाध्यायी का प्रसिद्ध सूत्र है – “राल्योभेद:”, अर्थात् “ऋ” और “लॄ” परस्पर स्थापन्न है, एक दूसरे के स्थान पर प्रयोग किए जाने योग्य हैं।

व्याकरण की विवेचना में जाने पर “ऋ” और “लॄ” के प्रकारों को भिन्न भिन्न नहीं गिना जाता है बल्कि सामूहिक रूप से “तीस” माना जाता है, जिसमें “ऋ” के अठारह और “लॄ” के बारह प्रकार हैं।

अतः, पाणिनि ने “राल्योभेद:” का सूत्र प्रतिपादित किया।

न केवल संस्कृत, बल्कि तमिल भी इस सूत्र का अनुसरण करती है।

उदाहरण के लिए देखें, संस्कृत साहित्य में राधा-कृष्ण के नृत्य को “रास्यनृत्य” कहा गया है, हिंदी की ही एक बोली “ब्रजभाषा” में “रास”। तमिल में माता पार्वती और शिव के नृत्य को “लास्यनृत्य” कहा गया है।

कहीं कहीं केवल माता पार्वती के नृत्य को “लास्यनृत्य” कहा गया है, और शिव के नृत्य को “तांडव”। ये दर्शन का एक भिन्न विषय है। संस्कृत-तमिल द्वैत चिंतन से कोसों दूर, अतः इसपर कभी पृथक् से।

“रास्यनृत्य” और “लास्यनृत्य” की बात करें तो स्पष्टरूप से तमिल ने संस्कृत का अनुसरण किया है, और अनुसरण पूर्वजों का ही किया जाता है, उत्तरवर्तियों का नहीं!

तमिल भाषा के पितामह:–

ऋषि अगस्त्य को “तमिल भाषा का पितामह” कहा जाता है। इसका आधार है, माहेश्वर सूत्र।

माहेश्वर सूत्र की कथा कुछ यूँ है कि शिव ने तांडव नृत्य करते हुए अपने डमरू को कुल चौदह बार बजाया, और हर बार एक भिन्न ध्वनि उत्पन्न हुयी। प्रत्येक ध्वनि को एक सूत्र मानकर ही संस्कृत भाषा का उद्भव हुआ, जिसे कालांतर में पाणिनि ने सँवारा।

ठीक उसी डमरू कथानक में एक अवांतर प्रसंग भी है, कि संस्कृत के सूत्रों के साथ साथ तमिल के सूत्र भी डमरू से प्रकट हुए। इन सूत्रों के साथ ऋषि अगस्त्य दक्षिण में चले गये और वहाँ उन्होंने तमिल व्याकरण का विकास किया।

हालाँकि मेरे हृदय में एक प्रश्न रह रह कर उठता है कि एक डमरू से एक बार में एक ही स्वर/सूत्र प्रकट हो सकता है ना, या एक से अधिक?

तथापि, हमारे पूर्वजों ने, माहेश्वर सूत्र की कथा में तमिल को भी स्थान दिया है। इसी कथा का उल्लेख, कमोबेश अंतर के साथ, तमिल के ग्रंथ “मलय तिरुवियाडल पुराणम” में है।

इसका स्पष्ट अर्थ है कि संस्कृत-तमिल द्वैत का चिंतन न केवल आज हम और आप कर रहे हैं, बल्कि ये प्राच्यकाल से होता आ रहा है।

अब इस द्वैत चिंतन के छिद्र देखिए।

ऋग्वेद के प्रथम मंडल में एक सौ पैंसठवें सूक्त से लेकर एक सौ इक्यानबेवें सूत्र तक के सत्ताईस सूक्त ऋषि अगस्त्य के नाम से प्राप्त होते हैं।

अव्वल तो यही प्रश्न है कि क्या ऋग्वेद जैसी कोई रचना तमिल के पास है? और दूसरा प्रश्न ये कि तमिल भाषा के पितामह ने किसी ग्रंथ में सत्ताईस सूक्त लिखे, तो क्या वह भाषा तमिल से अधिक नवीन होगी?

स्पष्ट है कि तमिल के प्रादुर्भाव से पूर्व ही संस्कृत का अस्तित्व था!

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मूलतथ्य की विवेचना पूर्ण हुयी। अब सहज प्रश्न है, कि संस्कृत और तमिल के मध्य इतना विभेद किसने उत्पन्न किया? – इसका सरलीकृत उत्तर है : “ढोंगी इतिहासकारों के द्वारा उत्पन्न किया गया संभ्रम है ये!”

आर्यों और द्रविड़ों पर इतिहासकारों के मत:-

वे कहते हैं, हड़प्पा सभ्यता अनार्यों की है और वेद आर्यों के। आर्यों ने ही द्रविड़ों की सभ्यता का विनाश कर, उन्हें उत्तर से खदेड़ कर सुदूर दक्षिण में पहुँचा दिया। तिस पर ही तो आर्य हड़प्पा लिपि को पढ़ने में असमर्थ हैं।

उनसे मेरा सीधा प्रश्न है, कि चलिए ठीक है, एक पल को आपकी बात मान भी लेते हैं कि आर्यों की भाषा और लिपि योजना हड़प्पा लिपि को पढ़ने में असमर्थ है और आप ही के अनुसार ये लिपि द्रविड़ों की है।

तो क्यों नहीं आप द्रविड़ लिपि का प्रयोग कर हड़प्पा लिपि को पढ़ लेते हैं? कम ऑन मैन, कम एंड रीड इट!

आप भी उनसे कहिए कि आइए सर, द्रविड़ लिपि की पुस्तक साथ लेकर आइएगा, चलिए हड़प्पा लिपि पढ़ने चलते हैं!

इति नमस्कारान्ते।

संस्कृत की तमिल से प्राचीनता पर Yogi Anurag जी का तथ्यपरक लेख

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