जन्मदिन विशेष : राम प्रसाद बिस्मिल

राम प्रसाद बिस्मिल

1897 में आज के ही दिन यानी 11 जून को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म हुआ था, बहुत कम ही लोग जानते हैं कि इस सरफरोश क्रांतिकारी के बहुआयामी व्यक्तित्व में संवेदशील कवि/शायर, साहित्यकार व इतिहासकार के साथ एक बहुभाषाभाषी अनुवादक का भी निवास था और लेखन या कविकर्म के लिए उसके ‘बिस्मिल’ के अलावा दो और उपनाम थे- ‘राम’ और ‘अज्ञात’.
इतना ही नहीं, 30 साल के जीवनकाल में उसकी कुल मिलाकर 11 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें से एक भी गोरी सत्ता के कोप से नहीं बच सकीं और सारी की सारी जब्त कर ली गयीं. हां, इस लिहाज से वह भारत तो क्या, संभवतः दुनिया का पहला ऐसा क्रांतिकारी था, जिसने क्रांतिकारी के तौर पर अपने लिए जरूरी हथियार अपनी लिखी पुस्तकों की बिक्री से मिले रुपयों से खरीदे थे.
‘बिस्मिल’ की माता मूलरानी का जिक्र किए बिना बात अधूरी रहेगी. वे ऐसी वीरमाता थीं कि शहादत से पहले ‘बिस्मिल’ से मिलने गोरखपुर जेल पहुंचीं तो उनकी डबडबाई आंखें देखकर भी धैर्य नहीं खोया। कलेजे पर पत्थर रख लिया और उलाहना देती हुई बोलीं, ‘अरे, मैं तो समझती थी कि मेरा बेटा बहुत बहादुर है और उसके नाम से अंग्रेज सरकार भी थरथराती है. मुझे पता नहीं था कि वह मौत से इतना डरता है! फिर जैसे इतना ही काफी न हो, उनसे पूछने लगीं, ‘तुझे ऐसे रोकर ही फांसी पर चढ़ना था तो तूने क्रांति की राह चुनी ही क्यों? तब तो तुझे तो इस रास्ते पर कदम ही नहीं रखना चाहिए था। ’
बताते हैं कि इसके बाद ‘बिस्मिल’ ने बरबस अपनी आंखें पोछ डालीं और कहा था कि उनके आंसू मौत के डर से नहीं।
शहीद होने से एक दिन पूर्व रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने एक मित्र को पत्र लिखा –

“19 तारीख को जो कुछ होगा मैं उसके लिए सहर्ष तैयार हूँ।
आत्मा अमर है जो मनुष्य की तरह वस्त्र धारण किया करती है।”
यदि देश के हित मरना पड़े, मुझको सहस्रो बार भी।
तो भी न मैं इस कष्ट को, निज ध्यान में लाऊं कभी।।
हे ईश! भारतवर्ष में, शतवार मेरा जन्म हो।
कारण सदा ही मृत्यु का, देशीय कारक कर्म हो।।
मरते हैं बिस्मिल, रोशन, लाहिड़ी, अशफाक अत्याचार से।
होंगे पैदा सैंकड़ों, उनके रूधिर की धार से।।
उनके प्रबल उद्योग से, उद्धार होगा देश का।
तब नाश होगा सर्वदा, दुख शोक के लव लेश का।।सब से मेरा नमस्कार कहिए,”
      तुम्हारा
बिस्मिल…

रामप्रसाद बिस्मिल की शायरी, जो उन्होने कालकोठरी में लिखी या गाई थी, उसका एक-एक शब्द आज भी भारतीय जनमानस पर उतना ही असर रखता है जितना उन दिनो रखता था। इस शायरी का हर शब्द अमर है।

सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना, बाजुए कातिल में है।।
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बताएं, क्या हमारे दिल में है।।

शहीद रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, जिन्होंने एक तरफ तो राष्ट्र-यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी, दूसरी तरफ़ उनके शब्दों ने हज़ारों ‘बिस्मिलों’ पैदा कर दिए। आज उनके जन्मदिवस पर उनको आकाश भर नमन!

🇮🇳🙏❤️

  • बहुत ही उम्दा रचना।उन वीरो को मेरा नमन जिसने खुद की परवाह किये बिना शहीद हो गए देश के लिए।👌👌

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