निर्णय लेने में इमोशंस का क्या काम….? (श्रीमद्भागवत गीता)

मैंने आज तक जितनी किताबें पढ़ी है, उसमे से श्रीमद्भागवत गीता सर्वश्रेष्ठ है, गीता की तुलना किसी अन्य पुस्तक से नही की जा सकती । आजकल बात तो यह है, जब आप गीता पढ़नी शुरू करते है, तो बाकी की सारी बुक आपको गीता की कॉपी लगती है ।
चलिए में आपसे एक सवाल करता हूँ –

एक चीज़ आपको अच्छा फील करवा रही है
ओर एक चीज़ आपको बुरा फील करवा रही है

आप किसको चुनेंगे, सीधा ओर सिम्पल है, में दावे से कह सकता हूँ, जो आपको अच्छा फील करवा रहा हो, आप उसे चुनेंगे ।

अर्जुन के सामने भी यही स्थिति थी, लेकिन कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध का मार्ग दिखाया …

कृष्ण ने सबसे पहले कार्य किया अर्जुन के इमोशंस खत्म करने का, अर्जुन को यह याद भी दिलवाया की तेरे सामने कौन है …

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌ ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति ॥
भीष्म पितामह, आचार्य द्रोण तथा संसार के सभी राजाओं के सामने कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए एकत्रित हुए इन सभी कुरु वंश के सद्स्यों को देख। (२५)

तब अर्जुन विषादग्रस्त होकर श्री कृष्ण से कहता है —

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ (३०)

हे केशव !! मेरे हाथ से गांडीव धनुष छूट रहा है और त्वचा भी जल रही है, मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा भी नही रह पा रहा हूँ।

तब उसी समय श्री कृष्ण ने अर्जुन के इमोशंस खत्म करते हुए कहते है, तू अपने इनोशन्स से नही, बुद्धि और धर्म के पक्ष से निर्णय ले अर्जुन, यहां तेरा कोई अपना नही है, कोई पराया नही है, श्री कृष्ण इन्ही इमोशंस को अर्जुन की मूर्खता कहते हुए उससे कहते है –

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌ ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।

हे अर्जुन! इस विपरीत स्थिति पर तेरे मन में यह अज्ञान कैसे उत्पन्न हुआ? न तो इसका जीवन के मूल्यों को जानने वाले मनुष्यों द्वारा आचरण किया गया है, और न ही इससे स्वर्ग की और न ही यश की प्राप्ति होती है।

यहां अर्जुन को साफ फटकार उसके निर्णय ना लेने की क्षमता के कारण पड़ रही है, श्री कृष्ण उसे कहते है, तू यूद्ध क्षेत्र में आकर कैसी बुद्धिहीन बातें करता है अर्जुन ? अगर तू किसी निर्णय पर ही नही पहुंच पा रहा, तेरा भटकाव ही खत्म नही हो रहा, तू तुझे ना तो यश मिलेगा, ओर ना स्वर्ग, तेरी तो बात की ही वेल्यू नही है, कभी तुम भाई कौरवों को मारने की प्रतिज्ञा करते हो, ओर अब तुम्हारे हाथ से गांडीव छूट रहा है ?

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥

हे अर्जुन !! उठ, यूद्ध के लिए खड़ा हो, यह नपुसंकता तुझे शोभा नही देती, तू अपने ह्रदय की दुर्बलता को त्याग और यूद्ध कर ।

इतने कठोर बचन कहने के बाद भी अर्जुन नही सुधरा … वह श्री कृष्ण से कहता है –

गुरूनहत्वा हि महानुभावा-ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌ ॥ (५)

अर्जुन कहता है, में अपने गुरु और भाइयो की हत्या करूँ, इससे अच्छा क्यो ना में भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन कर लूं, अर्जुन ने पूरा इमोशनल ड्रामा कुरुक्षेत्र में खड़ा कर रखा है, युद्ध क्षेत्र में पहुंचकर कहता है, कृष्ण में तो युद्ध नही करूँगा …

तब श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है –

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ (११)

अर्जुन …. तू पोथी पढ़े पंडित की तरह कब से हो गया ? शरीर से मोह करने का काम तो पंडित किया करते है, लेकिन तुम तो ज्ञानी योगी हो, तुम शरीर को इतना महत्व कब से देने लगे, जो यह शरीर निर्णय लेने की तुम्हारी शक्ति के आड़े आ गया ?

श्री कृष्ण ने युद्ध के पक्ष में वह तर्क दिए है, जो आज तक कोई नही दे पाया है।

श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे है, अपने जीवन मे कोई भी निर्णय फिलिंग की बेस पर नही लेना चाहिए, क्यो की – feeling are temporary, never take decision on basic on your feelings ….

इसलिए श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है, तो तुम्हे अच्छा फील करवा रही हो, जरूरी नही की वह चीज़ अच्छी हो …

गीता के छठे अध्याय में भी श्री कृष्ण यही समझाते है —

शनैः शनैरुपरमेद्‍बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌ ॥

Sri Krishna says to Arjun, “Arjun, you only listen to your intellect and your soul, इसके अलावा मन और ह्रदय तो तुम्हे पथभर्स्ट ही करेंगे ।

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ।।

Arjuna, you fight like an ascetic, without any temptation….. किसी Sके कोई मोह, कोई शत्रुत्ता नही, तुम कुरुक्षेत्र में मित्रता या शत्रुत्ता निभाने नही आये हो तुम्हारा कर्म केवल युद्ध करना है, ओर तुम केवल युद्ध करो ।

श्री कृष्ण अपने छठे अध्याय में यही समझाते है, अर्जुन अपने इमोशंस के काबू कर, क्यो की ज़्यादा खुशी, ओर ज़्यादा दुःख, दोनो स्थिति में लिया गया निर्णय गलत ही होता है । एक्चुली ज़्यादा खुशी या ज़्यादा दुःख के समय हमारा माइंड नॉर्मल माइंड से अलग रिएक्ट करता है, इसीलिए ज़्यादा खुशी या दुख में लिये गए निर्णय कर कारण हमें पछताना भी पड़ सकता है । ओर यही श्री कृष्ण का एक ओर ज्ञान है —

Avoid decision , when in extreme emoticons …

कोई भी निर्णय लेने से पहले अपने आप से यह सवाल जरूर कर ले, की यह निर्णय कहीं आप क्रोध या अटेचमेंट से तो नही ले रहे ? निर्णय सोच समझ कर लेने की बात पर हजारो पुस्तक लिखी जा चुकी है , जिसमे 7 habits of highly people तो बेस्ट सेलिंग बुक रही है, उसमे भी कुछ इसी तरह की बातें कहीं गयी है जो बातें गीता में आज 5000 वर्ष पूर्व ही कह दी गयी थी ।

श्री कृष्ण अर्जुन को कैसे समझाते है – what is good for society is good for you ….

कृष्ण जब अर्जुन का रथ लेकर कुरुक्षेत्र के मैदान के दोनों सेनाओं के बीचों बीच पहुंच गए, तो अपनो को देख अर्जुन का तो गांडीव हाथ दे छूट गया !!

मैं युद्ध नही करूँगा केशव !! अपने गुरु और पितामह को मार, अपने पुत्रों की लाशों को देखने का पाप, वो भी मात्र भूमि के टुकड़े के लिए ! यह पाप में नही करूँगा, यह तो मात्र भूमि है, अगर तीनो लोक भी मुझे मिले, तब भी नही …. इस युद्ध की कल्पना से ही मेरा तो शरीर सूखा जा रहा है !!

कृष्ण मुस्कुराए !! तुम अगर बाण नही चलाओगे तो क्या भीष्म या द्रोण, मरेंगे नही ?
आतयती अपने पाप से मारा जाता है अर्जुन ! किसी ओर के मारे नही ! देहधारी की म्रत्यु उसके शरीर मे ही निवास करती है ।

जानता हूँ पर ….

जानते हो तो मानते क्यो नही ? कॄष्ण बोले … जो मरता है, वह शरीर है, हम आत्मा है, शरीर नही, आत्मा का ना तो संगठन होता है, ना विघटन, वह पंचभूतों से संगठित नही हुई है, इसलिए उसका विघटन भी संभव नही है।

हम में से ऐसा कोई भी नही है, जिसका अस्तित्व आत्मा के किसी काल मे नही था , अथवा भविष्य के किसी काल मे नही होगा ! ओर शरीर क्या है ? वह तो ऋतु में आये किसी पुष्प के समान खिलता ओर मुरझा जाता है ! कोई नही भी तोड़ता तो मुरझा कर टहनी से गिर जाता है । जिन राजाओ ने युद्ध नही किये , क्या उनका देहांत नही हुआ ? जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु अवश्यभावी है, ओर जिसकी मृत्यु हुई है, उसका पुनर्जन्म निश्चित है । जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्यागकर नया वस्त्र धारण करता है । असत की सत्ता नही हो सकती, ओर सत का कभी अभाव नही हो सकता !

मैं क्या करूँ केशव !! हमारा शरीर वस्त्र के समान ही सही …. ; किन्तु जिन्हें में जीवित देखना चाहता हूं, जिन्हें इसी शरीर के रूप में जानता हूँ, उनके प्राण हरण करने का कर्म कैसे कर सकता हूँ !

कृष्ण ने मुस्कुराकर अर्जुन की ओर देखा ” यदि युद्ध विनाश है, तो क्या तुम्हारी इच्छा से प्रस्तुत हुआ है ? तुमने चाहा था कि युद्ध हो ?

नही !! अर्जुन ने उत्तर दिया !

“जब विनाश तुम्हारी इच्छा से प्रस्तुत नही होता ! जब विनाश तुम्हरी इच्छा से रुकता नही , तो तुमने कैसे मान लिया कि यह तुम्हारे कर्मो का फल है ? अगर तुम यह कर्म नही करोगे … तो क्या कर्म रुकेगा ?

अर्जुन कुछ चोंका ! ऐसा नही लग रहा था कि वे लोग कुरुक्षेत्र में खड़े है , ओर कृष्ण उसे युद्ध के लिए प्रेरित कर रहे है ! कृष्णा तो कुछ और ही कह रहे है, वह युद्ध संबंधित बात भी नही कर रहे ! वे उससे भिन्न कोई सत्य बता रहे है उसको, वे कह रहे है, तू कर्म नही करेगा, तो भी भावी भविष्य बदलेगा नही ! कर्म कोई और करेगा !

अर्जुन ने कृष्ण से पूछा, जब कर्म कोई ओर ही कर लेगा, तो मैं क्या करूँ?

अपना स्वधर्म !! कृष्ण बोले

सुनो अर्जुन !! कृष्ण अब धीरे धीरे अपना रूप बदलते जा रहे है, अर्जुन को लगा …

तुम क्षत्रिय हो ! भिक्षा मांगकर तुम नही रह सकते ! तुम्हे शाशन करना होगा, समाज का अनुशाशन करना होगा, दुस्ट दलन करना होगा, तुम राजनीति से नही भाग सकते, ओर राजनीति में रहकर ना युद्ध से बच सकते हो, ना वध से । आज युद्ध करने से अच्छा तुम भिख माँगकर खाना बता रहे हो… लेकिन क्षत्रिय का तेज अन्याय सहन नही कर सकता ! तुम राज्य के लिए नही, न्याय के लिए लड़ोगे, तुम्हारा स्वधर्म तुम्हे लड़वायेगा, तुम्हारी प्रकृति तुम्हे लड़वायेगी !

मैं ना लड़ना चाहूं तो ? !

तुम्हारा “मैं ” क्या है अर्जुन ? यह शरीर ? यह तो पंचभूतों से बना है, इसे प्रकृति ने बनाया है ।

तुम यह मानो अर्जुन ! की प्रकति तुम्हारे माध्यम से अन्याय से लड़ना चाहती है, इसलिए उसने तुम्हे क्षत्रिय बनाया है ! प्रकृति अपने कर्म का फल अवश्य देती है, किन्तु अपने नियमो के अधीन ! आम के वृक्ष से हमे आम की ही प्राप्ति होगी, ना कि अमरूद की , उस पेड़ से हमे केवल आम ही मिल सकता है ! इसलिए तुम्हे कर्म करना है, फल की आशा नही करनी, क्योंकि उस पर तुम्हारा कोई नियंत्रण नही है !!
जो कुछ भी कर रहा है अर्जुन, सब कुछ प्रकति कर रही है, तुम कुछ नही कर रहे, तुम्हारी प्रकृति कर रही है !

केशव ! तुम कह रहे हो कि मेरा कर्म फल पर कोई नियंत्रण नही ! अब तुम कह रहे हो कि कर्म पर भी नियंत्रण नही ?

कृष्ण हंसे …. हां अर्जुन ! तुम सोचो, यदि मधुमक्खी पुष्पों के रस से मधु ( शहद ) बनाती है, तो तुम क्या यह समझते हो यह उसके वश का काम है ? वह अपनी इच्छा से कर रही है मधुसंशय ? वह तो खुद उस शहद का भोग तक नही करती , गाय अपनी इच्छा से दूध को परिणित कर लेती है ? या फिर वो खुद के पीने के किये दूध बनाती है ? तुम क्या अपने भोजन पर नियंत्रण कर क्या अपने अनुसार रक्त, मल बना सकते हो ? यह सब प्रकृति ही तो कर रही है !!

तो अपनी वीरता पर अहंकार व्यर्थ है ! अपनी क्षमता पर गर्व तर्कहीन है ?? अर्जुन बोला ..

व्यर्थ !! पूर्णतः व्यर्थ , इसलिए कहता हूं, जब तक ज्ञान नही है , स्वधर्म ( कलयुग में गीता ) पर टिककर निष्काम कर्म करो !

अर्जुन को कृष्ण का रूप कुछ दिव्य सा होता लगा ! ज्ञान होने पर अपने स्वरूप को पहचानो, खुद को आत्मसात करने का प्रयास करो ! आत्मा और परमात्मा दोनो से मिलन होगा …

अर्जुन बैठा नही रह सका ! उनके सम्मुख वो कृष्ण नही थे, जो उसका रथ हांक रहे थे ! उनमें से तो कोई और ही कृष्ण प्रकट हुए है ! उसे कई बार लगा था, की वह जिस कृष्ण को जानता है, वह सम्पूर्ण कृष्ण नही है … वह उसका एक अंश मात्र है ! उस एक कृष्ण में ना जाने आज कितने कृष्ण दिख रहे है ! सम्पूर्ण कृष्ण को कभी जाना जा सकता है क्या ?

अर्जुन उठा, ओर कृष्ण के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़ा हो गया ! केशव हम दोनों हमेशा मित्र रहे है, लेकिन मेने तुम्हे अपना गुरु ही माना है । तुमने मुझे कर्मयोग ओर सांख्यकी के बारे में बताया, वो मेरे मस्तिक के किसी एक कोने में पड़ा रहता है । जीवन मे उसके व्यवहार का समय आते ही में सब भूल जाता हूँ, प्रकृति मुझसे क्या करवाना चाहती है में नही जानता, किन्तु अपने गुरु और पितामह पर बाण तो नही चला सकता …

मेने अपने मामा कंस को क्यो मारा था ?..

अन्याय ओर अत्याचार का नाश करने के लिए ! केशव!

तुम यहाँ क्या करने आये हो ?

अन्याय और अत्याचार को समाप्त करने के लिए !

तो फिर युद्ध करते क्यो नही ?

कैसे करूँ, चारो ओर मेरे अपने है !

यह तो अच्छा जवाब हुआ अर्जुन ! कोई और करे तो अधर्म, ओर तुम्हारे अपने करें तो अधर्म नही !!

दुर्योधन अधर्मी है अर्जुन ?

हां है !

तो तुन दुर्योधन का वध करो

नही कर सकता ! मार्ग में पितामह खड़े है ।

अर्थात पितामह के संरक्षण में अधर्म पोषित हो रहा है !

नही ! पितामह अधर्म नही कर सकते !

दुर्योधन अधर्मी है, भीष्म द्वारा संरक्षित है । भीष्म का वध किये बिना दुर्योधन को नही मारा जा सकता ! तो पहले किसे दंडित होना चाहिए ?

अर्जुन कुछ नही बोला ! शायद वह समझ चुका था, जो श्री कृष्ण उसे समझाना चाहते थे !
अधर्मी से भी बड़ा अधर्मी वो है, जो उनको संरक्षण देता है ।

गीता सार जारी है …..

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