विश्व के प्रथम क्रांतिकारी “क्षत्रिय विश्वामित्र”

क्या आप जानते है कि विश्व की प्रथम क्रांति की शुरुवात किसने की थी.?

विश्व मे प्रथम क्रांति किसी ओर ने नही, महाराज विश्वामित्र ने की थी । इसे जातयोत्कर्ष या कुशीक आंदोलन कहा जाता है । यह संघर्ष था ब्रह्मा और क्षात्र धर्म का , ओर यही संघर्ष आज तक चला आ रहा है, ब्राह्मणों के पास सनातनी शस्त्र था – ब्रह्म विद्या , यह ज्ञानबल ही सर्वसिद्धि का मूल है । और दूसरी ओर था बाहुबल, जो क्षत्रियो के पास था । शक्ति से ही संसार मे सब कुछ उपलब्ध है। चाहे वह धनः हो, सैन्यबल हो, या जनबल हो।

ब्राह्मण बल का आधार सदाचार, शील, स्नेह, सहिष्णुता, दान, क्षमा आदि है , ओर क्षत्रिय बल का आधार बाहु ।।

राजाओ को जो सुलभ नही, ऋषियों को वह दुर्लभ नही । यही सिद्धि वसिष्ठ को प्राप्त थी , जो कि महाराज विश्वामित्र को महाराज होने पर असाध्य थी । प्राचीन युग मे यही घटना दुबारा द्रोणाचार्य ओर ध्रुपद के बीच हुई । वास्तव में कोशिकी आंदोलन ब्राह्मणों ओर क्षत्रियो में सामंजस्यता स्थापित करने के लिए ही था ।।

जब रावण ब्राह्मणों पर घोर अत्याचार कर रहा था, अनेक ऋषियों की पत्नियों , पुत्रियो तथा साधारण जनता के बलात्कार और हत्या में वह लिप्त था, तब भी वसिष्ठ खामोश बैठे थे, क्यो की वसिष्ठ का बल ही सहिष्णुता ओर दया भाव था, ओर यही ब्राह्मण का गुण होता है, वसिष्ठ के अंदर क्रांति के बीज थे ही नही, की वह दसरथ या राम को रावण को मारने के लिए प्रोत्साहित करें ।।

यह काम विश्वामित्र ने किया, विश्वामित्र ने जहां राजऋषि ओर ब्रह्मऋषि का ज्ञान प्राप्त कर श्री राम को चक्रवर्ती सम्राट बनाया , ब्राह्मणों के विरुद्ध हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध क्रांति करने वाले विश्वामित्र ही थे, जिन्होंने अपने जीवन के कमाए सारे अस्त्र , शशत्र, अनुसंधान सामग्री राम को देकर रावण वध की पूरी तैयारी कर ली ।। ओर इसी कारण उस समय ब्राह्मणों ओर क्षत्रियो में ऐसी घनिष्ठता हो गयी, जिसका प्रभाव हम आज तक देखते है । विश्वामित्र ने ब्राह्मण बनकर, ब्राह्मणों को यह बताया, की आपका कार्य ही क्षत्रियो को युद्ध करने के लिए प्रोत्साहित करना है ।

रामायण में भी विश्वामित्र की भूरी भूरी प्रशंसा की गई है ।

रामायण कहती है, की विश्वामित्र वास्तव में शरीर धारण किये हुए धर्म था, विश्वामित्र बड़े बलवान थे । इससे बड़ी बात यह भी थी, की ज्ञान और तप में भी उनसे ऊपर कोई नही था । और यह बात उस समय कहीं गयी है, जब विश्वामित्र दसरथ से राम को मांगने अयोध्या आएं थे । अनेक अस्त्र शस्त्र चलाने और उनके निर्माण की कला विश्वामित्र के पास थी । तीनो लोको में चर अचर विश्वामित्र एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिनके युद्ध मे उतरने के बाद उन्हें केवल महादेव ही परास्त कर सकते थे । इतना ही नही, रामायण कहती है, की विश्वामित्र केवल योद्धा नही थे, बल्कि त्रिकाल दर्शी भी थे, ज्योतिष के क्षेत्र में भी विश्वामित्र का योगदान अतुलनीय है । महाभारत के अनुसार विश्वामित्र ने कपितय नक्षत्रों को भी ढूंढ निकाला था । कोसी नदी की खोज करने वाले ओर समाज मे उपयोग में लाने वाले भी विश्वामित्र ही थे । पहले इस नदी का नाम कौशिक नदी था ।

आज विश्वामित्र की ही जरूरत है, जिसमे युद्ध करने का शौर्य , ओर वसिष्ठ जैसी शांति तप हो । राम पैदा तो होते है, लेकिन राम को भगवान राम बनाने के लिए विश्वामित्र जैसे तपस्वी की जरूरत है ।।

साभार-  श्रीमान रामचंद्रम

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